भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी (चौठ) तिथिमे साँझखन चौठचन्द्रक पूजा होइत अछि ,जकरा लोक चौरचन पाबनि सेहो कहै छथि। अहि बेर ई पाबनि 22 अगस्त कें मनाओल जायत। अहि समय चंद्रमा कनी काल रहि डूबी जै छथि। पुराणमे प्रसिद्ध अछि, जे चन्द्रमा के अहि दिन कलंक लागल छलनि, ताहि कारण अहि समयमे चन्द्रमाक दर्शन के मनाही छैक। एहि दिन मिथिलाक घर-घर मे पान-पकवान रहैत अछि. पावनि दिन पुरिकिया, खजुरी, खीर, पूरी, मालपुआ, दालिपुरी त’ बनिते अछि संगहि अहि दिन फल मे केरा, लताम, खीरा, शरीफा, नेबो आदि अनेक फल (जे बारीझाड़ी मे सहज उपलब्ध रहैत अछि) रहैत अछि. मिथिलाक लोक पावनि मे साग, अंकुरी, झिमनी केर तरकारी ओ ओलक चटनी निश्चित रूपें खाइत छथि. चौरचन मे मिथिलाक आँगन ठाओ-पीढ़ी ओ अरिपन सं सुसज्जित रहैत अछि. हाथ उठयलाक बाद ब्राह्मण भोजन केर रीति अछि. एहि पावनिक बाद मिथिलाक लोक इन्द्रपूजन केर तैयारी मे लागि जायत.

मान्यता अछि, जे एहि समयक चन्द्रमाक दर्शन करबापर कलंक लगैत अछि। मिथिला में अकर निवारण हेतु रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा कायल जाइत अछि ! स्कन्द पुराण के अनुसार एक बेर भगवान कृष्ण के मिथ्या कलंक लागल छल,लेकिन ओ अहि वाक्य सअ कलंक मुक्त भेलाह !

‘सिंह: प्रसेनमवधीत्, सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक! मा रोदी:, तव एष स्यमन्तक:।।’
एकटा अन्य कथा के अनुसार , एक बेर गणेश भगवान के देखि चन्द्रमा हँसि देलखिन्ह । एहिपर गणेशजी चन्द्रमा के श्राप देलखिन्ह कि, जे अहाँ के देखत ओ कलंकित होयत। तखन चन्द्रमा भादव शुक्ल चतुर्थीमे गणेशक पूजा केलनि। ओ प्रसन्न भऽ कहलखिन्ह – अहाँ निष्पाप छी। जे व्यक्ति भादव शुक्ल चतुर्थी के अहाँक पूजा कऽ ‘सिंह प्रसेन…’ मन्त्रसँ अहाँक दर्शन करत ,तकरा मिथ्या कलंक नञि लगतै,आ ओकर सभ मनोरथ पुरतै। चन्द्रमा के दर्शन के समय हाथ में फल अवश्य रा और मंत्र के साथ दर्शन करी !

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