भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी तिथिमे साँझखन चौठचन्द्र केर पूजा होइत अछि जकरा लोक चौरचन पाबनि कहै छथि। एहि बेर इ पावनि २२ अगस्त के अछि। पुराणमे प्रसिद्ध छै जे चन्द्रमा के एहि दिन कलंक लागल छलनि। तेँ एहि समयमे हुनख दर्शनकेँ दोषापूर्ण मानल जैत अछि। मान्यता अछि जे एहि समयक चन्द्रमाक दर्शन करबापर कलंक लगैत अछि।तें एहि दोषक निवारण करबाक लेल अपना मिथिला में”सिंह: प्रसेन” वला मन्त्रक पाठ कैल जैत अछि।

चौठचन्द्रक पूजा:- ई चतुर्थी सूर्यास्तक बाद अढ़ाइ घण्टा धरिक, लेल जाइछ। जँ तिथि दू दिन एहि समय म पड़य तँ अगिला दिन व्रत ओ पूजा करी। भरि दिन व्रत क साँझखन अंगना म पिठार सँ अरिपन देल जाइछ। गोलाकार चन्द्र मण्डलपर केराक भालरि (पात) द’अ ओहिपर पकमान, मधुर, पूड़ी, ठकुआ, पिड़ुकिया, मालपूआ पायस आदि राखी। मुकुट सहित चन्द्रमाक मुँहक अरिपनपर केराक भालरि द रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा उज्जर फूल सँ पच्छिम मुहेँ करी। परिवारक सदस्यक संख्यामे पकमान युक्त डाली आ दहीक छाँछी क अरिपनपर राखी। केराक घौर, दीप युक्त कुड़वार, लावन आदिक अरिपनपर राखी। एक-एक डाली, दही, केराक घौर उठाऽ ‘सिंह: प्रसेन….’ मंत्रक संग ‘दधिशंखतुषाराभम्…’ मन्त्र पढ़ि समर्पित करी। प्रत्येक व्यक्ति एक-एक टा फल हाथमे ल’अ ओहि मन्त्र सँ चन्द्रमाक दर्शन कय प्रणाम करी।पुरुष वर्ग मड़र भांगाथि आ दक्षिणा उत्सर्ग क प्रसाद ग्रहण करथि।

चन्द्रमा प्रणाम मन्त्र-
‘दधि-शंख-तुषाराभं, क्षीरोदार्णव-संभवम्।
नमामि शशिनं भक्त्या, शंभोर्मुकुट भूषणम्।।’

चौठचन्द्र-
सिंह: प्रसेनवमवधीत सिंहो जाम्बवताहत: । सुकुमारक मारो दीपस्तेह्राषव स्यमन्तक: ।
अर्थात् दही, शंख ओ बर्फक समान स्वच्छ, क्षीर सागरसँ उत्पन्न चन्द्रमा (शशि) केँ भक्तिसँ प्रमाण करैत छी जे महादेवक मुकुटक भूषण थिका।

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